Friday, 1 December 2023

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही।। श्रीमद्भगवद्गीता 2.22

 


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। 

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही।। श्रीमद्भगवद्गीता 2.22

भावार्थ - ज्या प्रमाणे माणूस जुनी वस्त्रे टाकून देऊन दुसरी नवीन वस्त्रे धारण करतो, त्याच प्रमाणे जीवात्मा ही जुनी शरीरे टाकून दुसऱ्या नव्या शरीरात जातो. 

Just as human beings shed their old and worn-out clothes and don new attire, the atma (also referred to as dehi or soul) sheds an old and worn-out body to don a new body. |Bhagavad Gita – 2.22. |



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